Sunday, September 21, 2008

KHWAB



मैंने अक्सर ख्वाबों को टूटते देखा है ,
बिखरते देखा है ।
सोचा लोग ख्वाब क्यों देखते है,
क्यों सपनों में खोये रहते हैं,
जो हकीकत का शक्ल ले नही सकती,
लोग उन ख्वाबों को क्यों देखते हैं ।
मै भी ख्वाबों में घिरा रहता था,
अपने सपने ख़ुद बुन लिया करता था ,
उनको देखकर मै खुश हुआ करता था,
लेकिन जब मेरे ख्वाब टूटे तो,
सोचा लोग ख्वाब क्यों देखते है।
घनी काली रात का अँधेरा हो ,
या फ़िर सुबह का मौसम क्यों ना सुहाना हो,
ख्वाब देखो और देखते रहो ,
लेकिन ख्वाबों में जीना छोड़ दो ,
क्योंकि,
मैंने अक्सर ख्वाबों को टूटते देखा है ,
बिखरते देखा है .

Tuesday, September 16, 2008


हर मोड़ पर शुरुआत हो सकती है


कही भी बात हो सकती है


माना कि बहुत दूर हो आप हमसे


फिर भी


आँखें बंद करो तो


मुलाकात हो सकती है